रविवार, 31 अक्तूबर 2010

दरिया से मिलके हमने समंदर की बात की

दरिया से मिलके हमने  समंदर की बात की 
यानि कि अपने आप के अन्दर की बात की 
हारा था कोन, जंग का मतलब था क्या भला 
पोरस से मिलके हमने सिकंदर की बात की 
हर शक्श अपने जख्म दिखने लगा मुझे 
महफ़िल मे हमने जब भी सितमगर की बात की
उनकी जुबां पे  " मीत" का भी नाम आ गया 
उनसे किसी ने जब भी सुखनवर की बात की  
रोहित कुमार "मीत"

4 टिप्‍पणियां:

  1. हर शक्श अपने जख्म दिखने लगा मुझे
    महफ़िल मे हमने जब भी सितमगर की बात की

    bohot sundar panktiya :)

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  2. ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुंचाईये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
    ‘‘ आदत यही बनानी है ज्यादा से ज्यादा(ब्लागों) लोगों तक ट्प्पिणीया अपनी पहुचानी है।’’
    हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।

    मालीगांव
    साया
    लक्ष्य

    हमारे नये एगरीकेटर में आप अपने ब्लाग् को नीचे के लिंको द्वारा जोड़ सकते है।
    अपने ब्लाग् पर लोगों लगाये यहां से
    अपने ब्लाग् को जोड़े यहां से

    कृपया अपने ब्लॉग पर से वर्ड वैरिफ़िकेशन हटा देवे इससे टिप्पणी करने में दिक्कत और परेशानी होती है।

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  3. वाह, ऐसी उम्दा रचनाएं पढ़कर मजा आ जाता है और पढने का मन भी करता है. जारी रहें.
    --
    धनतेरस व दिवाली की सपरिवार बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं.
    -
    वात्स्यायन गली

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